बिहार के सरकारी विद्यालय के कक्षा 1 एवं 2 के छात्रों की मानसिक स्थिति(Mental Status of Class 1 & 2 students of Government School of Bihar)

बिहार के सरकारी विद्यालय के कक्षा 1 एवं 2 के छात्रों की मानसिक स्थिति (Mental Status of Class 1 & 2 students of Government School of Bihar)


प्रस्तावना

बिहार के सरकारी विद्यालयों के कक्षा 1 एवं 2 के छात्रों की मानसिक स्थिति (Mental Status of Class 1 & 2 Students of Government Schools in Bihar)
पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है। इस आयु वर्ग के अधिकांश बच्चों की उम्र लगभग 5 से 7 वर्ष होती है। यह उनके जीवन का वह चरण है, जब वे पहली बार घर के सुरक्षित और स्नेहपूर्ण वातावरण से निकलकर विद्यालय की नई दुनिया में प्रवेश करते हैं।

इन बच्चों ने अब तक अपना अधिकांश समय माँ, पिता, दादा-दादी या परिवार के अन्य सदस्यों के साथ बिताया होता है। छोटी-छोटी आवश्यकताओं से लेकर भावनात्मक सहारे तक, वे हर बात के लिए अपने परिवार पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में विद्यालय उनके लिए एक बिल्कुल नया और अपरिचित वातावरण होता है। यही कारण है कि प्रारंभिक दिनों में अनेक बच्चों के मन में विद्यालय को लेकर डर, संकोच या असहजता देखी जाती है।

नामांकन के बाद इन्हीं छोटे बच्चों को प्रतिदिन प्रातः 9:00 बजे से शाम 4:00 बजे तक विद्यालय में रहना पड़ता है। विद्यालय आने से पहले उनका दैनिक जीवन पूरी तरह स्वतंत्र और परिवार-केंद्रित होता है। वे अपनी इच्छा के अनुसार खेलते, सीखते और परिवार के साथ समय बिताते हैं। लेकिन विद्यालय में प्रवेश के बाद उनकी दिनचर्या, वातावरण और जिम्मेदारियों में अचानक बड़ा परिवर्तन आ जाता है। इस परिवर्तन का सीधा प्रभाव उनकी मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक स्थिति पर पड़ता है।

इसीलिए कक्षा 1 एवं 2 के बच्चों की मानसिक स्थिति को समझना प्रत्येक शिक्षक, अभिभावक और शिक्षा-प्रशासक के लिए अत्यंत आवश्यक है। तभी हम उनके लिए ऐसा विद्यालयी वातावरण बना सकते हैं, जहाँ वे भयमुक्त होकर सीखें, खेलें और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ें।


कक्षा 1 एवं 2 के छात्रों की मानसिक स्थिति

जब भी मुझे कक्षा 1 एवं 2 के बच्चों की कक्षा में जाने का अवसर मिलता है, तो वहाँ एक अलग ही दुनिया दिखाई देती है। कभी उनकी मासूम हरकतों पर हँसी आती है, तो कभी उनकी शरारतों या अनुशासनहीनता पर गुस्सा भी आता है। लेकिन अगले ही क्षण उनकी छोटी-सी उम्र और मानसिक स्थिति को देखकर वह गुस्सा अपने आप स्नेह और अपनापन में बदल जाता है।

धीरे-धीरे मैंने महसूस किया कि इन बच्चों के व्यवहार को समझे बिना उनके बारे में कोई भी राय बना लेना उचित नहीं है। आखिर वे केवल 5 से 7 वर्ष की आयु के बच्चे हैं, जिन्हें प्रतिदिन सुबह 9:00 बजे से शाम 4:00 बजे तक विद्यालय में रहना पड़ता है। इतनी छोटी उम्र में घर के स्नेहपूर्ण वातावरण से दूर रहकर विद्यालय की दिनचर्या के अनुसार स्वयं को ढालना उनके लिए आसान नहीं होता। इसलिए उनके व्यवहार को उनकी मानसिक अवस्था और आयु के संदर्भ में समझना आवश्यक है।


विद्यालय में आने के बाद होने वाले परिवर्तन

विद्यालय में नामांकन के बाद बच्चों के जीवन में अचानक कई परिवर्तन आ जाते हैं। जो बच्चा अब तक पूरे दिन अपने परिवार के बीच रहता था, उसे पहली बार कई घंटों तक घर से दूर रहना पड़ता है। प्रारंभिक दिनों में यह बदलाव उसके लिए सहज नहीं होता।

विद्यालय में उसे नए शिक्षक, नए सहपाठी और बिल्कुल नया वातावरण मिलता है। घर में जहाँ वह अपनी इच्छा के अनुसार खेलता और रहता था, वहीं विद्यालय में समय का पालन करना, कक्षा में बैठना, शिक्षकों की बात सुनना तथा अन्य बच्चों के साथ मिलकर सीखना पड़ता है। यह सब उसके लिए एक नया अनुभव होता है।

इसी कारण कुछ बच्चे विद्यालय के शुरुआती दिनों में रोते हैं, कुछ अपनी माँ को याद करते हैं, कुछ डरे-सहमे रहते हैं, जबकि कुछ बच्चे बिल्कुल चुप हो जाते हैं। दूसरी ओर, कुछ बच्चे जल्दी ही नए वातावरण में घुल-मिल जाते हैं। यह अंतर प्रत्येक बच्चे की मानसिक स्थिति, पारिवारिक वातावरण और स्वभाव पर निर्भर करता है।

इसलिए कक्षा 1 एवं 2 के बच्चों के व्यवहार को केवल अनुशासन की दृष्टि से नहीं, बल्कि उनकी आयु और मानसिक विकास को ध्यान में रखकर समझना चाहिए।


निष्कर्ष

बिहार के सरकारी विद्यालयों में कक्षा 1 एवं 2 के छात्रों के लिए विद्यालय का समय प्रातः 9:00 बजे से शाम 4:00 बजे तक निर्धारित है। विद्यालय पहुँचने के लिए बच्चों को लगभग 8:00 बजे से ही तैयार होना पड़ता है। घर से निकलने से लेकर वापस लौटने तक उनका लगभग 9 घंटे या उससे अधिक समय विद्यालय और उससे जुड़ी गतिविधियों में व्यतीत होता है।

केवल 5 से 7 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए यह समय कम नहीं है। इस आयु में बच्चे अभी भावनात्मक रूप से अपने परिवार पर अधिक निर्भर होते हैं। इसलिए उनके व्यवहार, सीखने की क्षमता, एकाग्रता, थकान, खेल की आवश्यकता तथा मानसिक स्थिति पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

यदि हम चाहते हैं कि प्रारंभिक कक्षाओं के बच्चे आनंदपूर्वक सीखें और विद्यालय के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करें, तो केवल पढ़ाई पर ही नहीं, बल्कि उनकी मानसिक और भावनात्मक आवश्यकताओं पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा। यही एक संवेदनशील, बाल-केंद्रित और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था की पहचान है।

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